वर्ष बीतते क्षण ना लगता, पर
इस बीते बरस में मानों
हर क्षण में वर्ष बीता है
जिसके सानिध्य को तरसे मन, बस
उसके चित्र में चित्त अब रीता है
कोमल कुसुम-किसलय-सा था
पिछली बार जब मिले थे हम
आलिंगन में दबाव ना ज्यादा हो
सोच यही रुकते थे दम
भिज्ञ बस क्रंदन-ध्वनि से
स्मित रेखाओं से थी पहचान
आज साल का हुआ जाता है
पिता की [...]
Archive for the ‘Own Writings’ Category
पुत्र के जन्मदिन पर
Posted in My Poems, tagged Adyant, Birthday, first birthday on October 7, 2009 | 1 Comment »
कल और आज
Posted in My Poems, Poetry on September 19, 2009 | 1 Comment »
भरी दोपहर में होती बारिश देख
याद आ गए वो दिन जब
गिरते वारि-बूँदों की आवाज सुन ही
मचल उठते थे पाँव
दौड कर आना आँगन में
तीब्र हवा और तेज जल-धार बीच
अनसुनी करना वो डाँट जो अनर्थक
माँ की मुस्कान छिपाने का प्रयास करते
बस भींगना, भींगना और भींगते रह जाना
जल के भार से सिक्त
शरीर से चिपके कपडे और
नंगे पाँव के [...]
Puja at Purandevi temple
Posted in My Poems, tagged purandevi, Purnea on June 9, 2008 | 1 Comment »
The Symphony of cuckoos
in the shades of green;
And the lake nearby
So still and serene;
The chants of mantras
rhyming with the chime
making one oblivious
to the passage of time
May, like this moment, ever,
tranquility of mind prevails.
मज़ाक
Posted in Concerns, My Poems on June 20, 2007 | 1 Comment »
भरी सङ़क पे गोङी रोक तुम
धुएँ के छल्ले उङाते हो ।
सिगरेट का ङब्बा खोल
आवरण सङ़क पे फैलाते हो ।
माचिस की तिल्ली बुझा कर
पौधों के बीच फेंक आते हो ।
और फिर, आराम से कश ले
हवा में छल्ले बऩाते हुए,
सङक पे फैली गंदगी इंगित कर
नगरपालिका को गाली दे जाते हो !
पहली बूँद
Posted in My Poems, Poetry on April 13, 2007 | 1 Comment »
वैशाख की तपती संध्या में
गिरी पहली बूँद बारिश की
यों, मिल गई खाक में जब,
उत्तर में धरा ने अपनी सुगंध
उडे़ल दी हवा में मंद मंद
कि चल पडा समीर त्रिविध बन ।
ऐसे में एक थका तन
पाकर बूँदों की फुहार,
स्पर्श करती बयार और
धरती का सुगंधित प्यार
हो उठा प्रफुल्लित कि जैसे
कर लिया हो प्रेयसी ने आलिंगन-बद्ध ।
मृत्यु
Posted in My Poems on October 6, 2006 | 1 Comment »
जन्म सौ बार मिलता जीवन में,
जब भी मन बुने कोई सपना प्यारा
याकि टूटे सपना कोई पुराना ताकि
नव-स्वप्न-किसलय-दल खिल सकें ।
परंतु मृत्यु एक बार मिलती है ।।
झूठ मिलता हर पग पर
जब भी ज्ञान कोई पुराना
लिखती लेखिनी यह कहकर
वह तेरा था, यह मेरा है ।
परंतु सत्य एक बार सिलता है ।।
नहीं [...]
लाल बत्ती
Posted in My Poems on September 18, 2006 | 2 Comments »
ट्रैफिक बत्ती लाल होने पे भी
जब युवक ने गाड़ी बढ़ाई
हवलदार ने जल्दी में
हवा में लाठी घुमाई ।
और गरजकर कहा
“सौ का पत्ता निकाल”
पर इससे पहले कि पर्ची कटती,
पीछे से आई एक कार
चमकते श्वेत रंग पे थी
एक बत्ती लाल सवार ।
ड्राईवर ने ब्रेक के बदले
जोर से हॉर्न [...]
सीख
Posted in My Poems on September 16, 2006 | 2 Comments »
गाडी सुरंग से गुजरी,
ना रौशनी की लीक
ना अंत का आसार
था तो बस अंधकार का साम्राज्य।
हाथों को ना सूझते हाथ,
संपूर्ण देह मानो हुआ निराकार
थी तो बस एक अनुभूति और
‘स्व’ का आभास।
तब तम ने सिखाया मुझको -
देख क्या है तू
एक अनुभूति, एक एहसास
और एक विश्वास कि तू “तू” है ।।
मन रे तू आस ना खोना
Posted in My Poems on August 24, 2006 | 8 Comments »
Thought of sharing a poem of mine.
मन रे तू आस ना खोना ।
पथ कंकरीले भी आते हैं,
पग में कंकड चुभ जाते हैं,
लहूलहान हों पाँव अगर भी,
हे पथिक, विश्वास ना खोना।
मन रे तू आस ना खोना ।।
छिप जाए जब तम में दिनकर,
ना करता सूचित वह प्रलय को
कहता जयद्रथ-वध निकट है
सो [...]